Saturday, July 19, 2008

दाँतों की देखभाल कैसे करें

मनुष्य की मुस्कुराहट तभी सार्थक होती है जब उसके दाँत चमकते और स्वस्थ रहते हैं। स्वस्थ मसूड़े, स्वस्थ दाँत ही हमारी हँसी की पहचान है, परन्तु अगर इन मोतियों का ख्याल नहीं रखा, तो इनमें दाग-धब्बें पड़ सकते हैं। भोजन के समय यदि दाँतों में दर्द या चबाने में तकलीफ हो रही हो तो तुरन्त किसी डॉक्टर के पास जाएँ, इलाज कराएँ।

खाने-पीने के बाद दाँतों को अच्छी तरह से साफ कर लें। सही समय पर दाँतों को साफ नहीं किया गया तो जिन्जीवाइटिस, पीरियोडेन्टिस की समस्या आपको परेशान कर सकती है। जिन्जीवाइटिस मसूड़ों में टॉर्टर, प्लाक के कारण होते हैं। इससे मसूडे दुखदायी, लाल हो जाते हैं। इस समस्या से मसूड़े फूल जाते हैं। अगर जिन्जीवाइटिस का इलाज ठीक प्रकार से नहीं किया गया तो यह पीरियोडेन्टिस जैसी बीमारी के रूप में उभर सकती है।

पीरियोडेन्टिस में मसूड़े़ तथा दाँतों से जुड़े हुए कनेक्टिव टिश्यूस जो दाँतों को सहारा देते हैं वे नष्ट एवं खत्म हो जाते हैं। दाँत अपनी जगह पर नहीं रह पाते हैं। इन समस्याओं से निजात पाने के लिए कुछ सरल उपाय :-

दातुन - प्रतिदिन दो बार दातुन करना चाहिए। प्रात:काल तथा रात को खाने के बाद आपको दातुन करना चाहिए। इसके लिए जिस टूथब्रश का इस्तेमाल कर रहे हैं उसे तीन से चार महीने बाद बदल देना चाहिए क्योंकि कुछ समय बाद वह खराब हो जाता है तथा मसूडों में लगने लगता है।
* दाँतों को साफ करने के लिए सही तरीके अपनाना चाहिए। टूथब्रश को आप मसूडों से लगाकर 45 डिग्री के ऐंगल पर रखकर धीरे से दाँतों पर घुमाएँ।
* मंजन का प्रयोग करने पर भी अगर आप के दाँत साफ नहीं हों तो फ्लोराइड दंत मंजन का प्रयोग करें।
* हर समय खाने के बाद दाँतों को पानी से कुल्ला करके साफ रखना चाहिए। इससे दाँतों में अन्न के कण चिपके हुए नहीं रहते।
* माउथवाश का प्रयोग करना चाहिए जिससे दातों में सड़न की दुर्गन्ध पैदा ना हो तथा कीटाणु का प्रकोप दाँतों पर न हो।
* भोजन करने के बाद फ्लौस करें जिससे दाँतों की पूरी सफाई होती है। फ्लौस करने के तरीके अलग हैं। फ्लौस के पैक में रस्सी होती है जिसे दाँतों के बीच में अटकाकर साफ किया जाता है। सी रूप के आकार में फ्लौस के द्वारा दाँत पर जमी गंदगी को धीरे से हटाकर साफ करते हैं।
* जिन्जीवाइटिस की बीमारी को हल करने के लिए विटामिन सी, विटामिन डी, लौंग के तेल तथा क्रेनबेरी जूस जैसी वस्तुओं का प्रयोग कर सकते हैं
* दाँतों की सफाई के लिए खीरा,गाजर,मूली तथा सेब चबा चबा कर खाना भी लाभदायक होगा।

डाइबिटीज रोगी का आहार

आज भारत में 4.5 करोड़ व्यक्ति डायबिटीज (मधुमेह) का शिकार हैं। इसका मुख्य कारण है असंयमित खानपान, मानसिक तनाव, मोटापा, व्यायाम की कमी। इसी कारण यह रोग हमारे देश में बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। डायबिटीज चयापचय से संबंधित बीमारी है। इसमें कार्बोहाइड्रेट और ग्लूकोज का ऑक्सीकरण पूर्ण रूप से नहीं हो पाता है।

इसका मुख्य कारण है। 'इंसुलिन की कमी'। इंसुलिन नामक हार्मोन पेनक्रियाज की इन्स्लैट ऑफ लैगरहैस द्वारा निकलता है, जो ग्लूकोज का चयापचय करता है। रक्त में ग्लूकोज की मात्रा सामान्य से ज्यादा तथा सामान्य से कम होना दोनों ही स्थितियाँ घातक सिद्ध होती हैं। इस रोग को प्रारंभिक अवस्था में आहार व्यायाम तथा दवाइयों द्वारा काबू में किया जा सकता है।

डायबिटीज में आहार की भूमिक
ऐसे रोगियों के आहार की मात्रा कैलोरी पर निर्धारित रहती है, जो कि प्रत्येक रोगी की उम्र, वजन, लिंग, ऊँचाई, दिनचर्या व्यवसाय आदि पर निश्चित की जाती है। इसके आधार पर प्रत्येक व्यक्ति की अलग-अलग आहार तालिका बनती है। हम यहाँ पर एक सामान्य डायबिटीज के रोगी की आहार तालिका दे रहे हैं। इसमें भोजन में समय एवं मात्रा पर विशेष ध्यान रखना अतिआवश्यक है।

आहार तालिक
सुबह 6 बजे : आधा चम्मच मैथीदाना पावडर+पानी। सुबह 7 बजे : 1 कप बिना शक्कर की चाय +1-2 मैरी बिस्किट। नाश्ता सुबह 8.30 बजे : 1 प्लेट उपमा या दलिया+आधी कटोरी अंकुरित अनाज+100 एमएल मलाईरहित बिना शक्कर का दूध। सुबह 10.30 बजे : 1 छोटा छिलके सहित फल केवल 50 ग्राम का या 1 कप पतली छाछ बिना शक्कर की या नींबू पानी। दोपहर का भोजन 12.30 बजे : 2 मिश्रित आटे की सादी रोटी, 1 कटोरी पसिया निकला चावल+1 कटोरी सादी दाल+1 कटोरी मलाईरहित दही+आधा कप सोयाबीन या पनीर की सब्जी +आधा कप हरी पत्तेदार भाजी+सलाद 1 प्लेट। अपराह्न 4 बजे : 1 कप बिना शक्कर की चाय+1-2 मैरी बिस्किट या 1-2 टोस्ट। शाम 6 बजे : 1 कप सूप। रात का भोजन 8.30 बजे : दोपहर के समान। रात को सोते समय 10.30 बजे : 1 कप बिना शक्कर का मलाई रहित दूध।

* जब-जब भूख सताए तो उपयोग करें : कच्ची सब्जियाँ, सलाद, काली चाय, सूप, पतली छाछ, नींबू पानी।
* इससे बचें : गुड़, शक्कर, शहद, मिठाइयाँ, मेवे।
* डायबिटीज के रोगियों के लिए सलाह : प्रतिदिन 35-40 मिनट तेज चलें।
* खाना एक साथ न खाकर थोड़ी-थोड़ी देर में थोड़ा-थोड़ा खाएँ।
* दिनभर के भोजन में तेल का इस्तेमाल 3-4 चम्मच (रिफाइंड) करें।
* भोजन आहार तालिका के अनुसार दिए हुए निर्धारित समय पर ही करें तथा निश्चित मात्रा में करें।
* भोजन में रेशेदार पदार्थों का सेवन ज्यादा करें। इससे रक्त में ग्लूकोज का स्तर धीरे-धीरे बढ़ता है और रक्त में ग्लूकोज की मात्रा नियंत्रित रहती है।
* उपवास न करें और न ही खूब दावत उड़ाएँ। इस तरह अगर आप इन बातों पर अमल करेंगे तो आप स्वयं इस रोग को नियंत्रित कर सकते हैं।

पहचानिए मुख कैंसर के लक्षण

मुख कैंसर के आरंभिक लक्षणों को मरीज नजरअंदाज करते हैं। तंबाकू का गुटखा मुँह में दबाकर रखने से कैंसर को खुला न्योता मिल जाता है। बावजूद इसके कि वे मुँह में हो रहे जख्मों की नियमित जाँचें कराएँ वे इसकी ओर ध्यान ही नहीं देते। जब मर्ज बढ़ जाता है तबतक बहुत देर हो चुकी होती है।

भारत में मुख कैंसर के मरीज पूरे विश्व में सबसे ज्यादा हैं। मुख कैंसर के करीब 90 प्रतिशत मरीज तंबाकू का सेवन करते हैं। अधिकतर लोग तंबाकूयुक्त गुटखा मुँह में या दाँतों व गाल के बीच में दबाकर रखते हैं। उन्हें यहीं पर कैंसर हो जाता है। तंबाकू के प्रयोग की अवधि व उसकी मात्रा के अनुपात में जोखिम बढ़ जाता है। इसके अलावा, शराब का अत्यधिक सेवन भी मुख कैंसर का जोखिम बढ़ाती है। टूटे हुए दाँत का चुभता हिस्सा, खराब फिटिंग्स वाले दाँत भी बार-बार रगड़कर मुख कैंसर का कारण हो सकते हैं।
मुख कैंसर के लक्षण
मुख में छाला या गठान जो लंबे समय से ठीक नहीं हो रही हो।
छाला जिसको हाथ लगाने पर खून आता हो।
मुख में खुरदुरापन लगना।
गाल पर सूजन या गठान।
मुँह खुलने में या खाना खाने में दर्द या परेशानी।
जबड़े में सूजन या गठान।
मुख से बार-बार खून आना।

मुख कैंसर को प्रारंभिक अवस्था में पकड़ने के लिए व उपरोक्त लक्षणों की जाँच के लिए, 'स्वमुख परीक्षण' हर तंबाकू का सेवन करने वाले व्यक्ति को तो अवश्य ही करना चाहिए।

स्वपरीक्षण
अपनी उँगलियों को एक-दूसरे से चिपकाकर जोड़ लें। अब मुँह खोलकर इसमें चारों उँगलियों को इस तरह घुसाने की कोशिश करें कि अंगूठे के पास की उँगली ऊपर वाले दाँतों को स्पर्श करे और नीचे दाँतों पर सबसे छोटी उँगली हो। अब देखें कि चारों उँगलियाँ अंदर जा रही हैं या नहीं। इससे यह पता लगेगा कि आप अपना मुँह खोल पा रहे हैं अथवा मुश्किल आ रही है।

Friday, May 16, 2008

प्रदूषण से ख़ून जम जाने का ख़तर

एक अमरीकी अध्ययन में पाया गया है कि प्रदूषित हवा और ट्रैफ़िक के धुएँ से जिस्म के अंदर ख़ून के जम जाने का ख़तरा बढ़ जाता है.
'हार्वर्ड स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ' में किए गए इस अध्ययन के अनुसार जैविक ईंधन के जलने से जो धुआँ निकलता है उसमें बेहद छोटे आकार के ऐसे रासायनिक कण होते हैं. इनसे हृदय रोग का ख़तरा बढ़ जाता है.
इन कणों की वजह से खून इतना गाढ़ा हो जाता है कि हृदय गति तक रुक सकती है.
इस शोध के दौरान ये भी पता चला कि धुएँ और प्रदूषण से निकलने वाले ये ज़हरीले रासायनिक कण पैरों की धमनियों में बहने वाले खून को भी गाढ़ा कर देते हैं जिससे ‘डीप वेन थ्रॉमबॉसिस’ यानी ‘डीवीटी’ या ‘धमनियों में अवरोध’ का ख़तरा बढ़ जाता है.
वैज्ञानिकों ने इस शोध के लिए तक़रीबन 2000 लोगों को चुना था. वैज्ञानिकों ने पाया कि प्रदूषण से खून चिपचिपा और गाढ़ा हो जाता है.
गाढ़ापन
शोध में ये बात भी सामने आई कि चुने गए 2000 लोगों में से यूरोप के शहर इटली के रहने वाले 900 लोगों में धमनियों में अवरोध यानी डीवीटी की बीमारी पैदा हो गई.
वायु प्रदूषण से धमनियों के अंदर खून के थक्के जम जाने की आशंका बढ़ जाती है

इन लोगों के खून में 'ब्लड क्लॉट' या खून के थक्के देखे गए. खून के ये थक्के पैरों की धमनियों से होते हुए फेफड़ों में पहुँच कर एक बड़ा ख़तरा पैदा कर सकते हैं.
वैसे 'डीवीटी' यानी धमनियों में खून के जम जाने का ख़तरा उन लोगों को ज़्यादा होता है जो ज़्यादा देर तक एक ही जगह बैठकर काम करते हैं.
जैसे, हवाई या रेल यात्रा के दौरान ज़्यादा देर तक एक ही जगह पर बैठे रहना या फिर दफ़्तरों में एक ही जगह पर बैठकर काम करना.
इसी लिए सलाह दी जाती है कि दफ़्तरों में आप एक ही जगह पर बैठकर काम न करें बल्कि बीच-बीच में अपनी कुर्सी पर ही कुछ हल्की-फुल्की कसरत कर लें या फिर चलते फिरते काम करें.
क्या हैं आंकड़े ?
वैज्ञानिकों ने इस शोध के दौरान उन इलाक़ों के प्रदूषण के नमूने भी लिए जिन जगहों पर ये लोग रहते हैं।

किसी शख्स के खून में इन ज़हरीले रासायनिक कणों की मात्रा के हर 10 माइक्रोग्राम बढ़ने पर डीवीटी का ख़तरा 70 प्रतिशत तक बढ़ जाता है.
प्रदूषण विभाग के अनुसार भी वातावरण में इन छोटे रासायनिक कणों की मात्रा 50 माइक्रोग्राम से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए.
इस शोध को अंजाम देने वाले डॉक्टर एंद्रिया बासारेली कहती हैं, "हमारे शोध के मुताबिक़ प्रदूषण बढ़ने से किसी भी शख्स में डीवीटी का ख़तरा बढ़ जाता है."
डीवीटी चैरिटी लाइफ़ब्लड के निदेशक डॉक्टर बेवेरली हंट कहते हैं, "पिछले कुछ दिनों से चल रहे हमारे शोध से ये बात सामने आई है कि वायु प्रदूषण से दिल की बीमारियों और हृदय गति रुक जाने का ख़तरा काफ़ी बढ़ जाता है."
"इस शोध से पहली बार पता चला है कि वायु प्रदूषण से धमनियों के अंदर खून के थक्के जम जाने की आशंका बढ़ जाती है."
वैज्ञानिक मानते हैं कि थोड़ी ही कोशिशों से वायु प्रदूषण को आसानी से काबू में किया जा सकता है.
वैसे, अमरीका में हुई इस खोज के बाद ये कहा जा सकता है कि भारत में महानगरों के अलावा कानपुर, पुणे और दूसरे शहरों में दिल के मरीज़ों की संख्या क्यों तेज़ी से बढ़ रही है.

बच्चों में बढ़ रहा है मधुमेह का रोग

अहमदाबाद। क्या आप जानते है कि तनाव के कारण मधुमेह पीड़ित बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। माता-पिता बच्चों को पढ़ाई के साथ अन्य क्षेत्रों में भी आगे बढ़ाने के लिए उन पर दबाव डालते हैं। परिणामस्वरूप बच्चे तनाव में रहते हैं और मधुमेह के शिकार होते हैं।मधुमेह विशेषज्ञ संजीव पाठक ने मंगलवार को ‘सैनोफी-एवेनटीस डिस्पोजेबल इंसुलिन पेन’ को पेश करते हुए कहा कि, “तनाव मधुमेह का मुख्य कारण है। तनाव के दौरान फास्ट फूड खाने वाले दूसरी कक्षा के छात्र भी मधुमेह के शिकार हो सकते हैं।”
वह कहते हैं कि, “बच्चों को खेलने के लिए प्रेरित करने की बात करते हुए अभिभावक उन्हें जानी-मानी टेनिस खिलाड़ी स्टेफी ग्राफ बना देना चाहते हैं। यह बच्चों में तनाव पैदा करता है जिससे वे मधुमेह से पीड़ित हो जाते हैं।”देश में तीन करोड़ से ज्यादा मधुमेह मरीज हैं। ‘सैनोफी-एवेनटीस’ पहले से भरा ‘डिस्पोजिबल इंसुलिन पेन’ है जिसे ‘सोलोस्टार’ कहते हैं। यह ‘हाइपरग्लाईसेमिया के टाइप 1’ और ‘टाइप 2’ मधुमेह के उपचार में प्रयोग किया जाता है। गुजरात में इसकी कीमत 884 रुपए हैं।
‘सैनोफी-एवेन्टीस कार्डियो-मेटाबोलिज्म’ व्यवसाय इकाई के वरिष्ठ निदेशक सुशील उमेश कहते हैं कि, “सोलोस्टार आसानी से प्रयोग किया जाने वाला इंसुलिन पेन है। यात्रा के दौरान भी मरीज आसानी से इसे अपनी जेब में ले जा सकता है। चिकित्सकों और नर्सों द्वारा इस पेन को मधुमेह मरीजों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।”पाठक ने आगे कहा कि आनुवांशिक रूप से गुजरात में मधुमेह होने की सम्भावना ज्यादा कही जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को इंसुलिन का प्रयोग करने में शर्म महसूस नहीं होनी चाहिए। यह दवा नहीं है। शरीर की जरूरतों को यह पूरा करता है।

Wednesday, April 9, 2008

Dyslexia differs by language

WASHINGTON: Dyslexia affects different parts of children's brains depending on whether they are raised reading English or Chinese. That finding, reported in online edition of Proceedings of the National Academy of Sciences , means that therapists may need to seek different methods of assisting dyslexic children from different cultures.

"This finding was very surprising to us. We had not ever thought that dyslexics' brains are different for children who read in English and Chinese," said lead author Li-Hai Tan, a professor of linguistics and brain and cognitive sciences at the University of Hong Kong. "Our finding yields neurobiological clues to the cause of dyslexia."

Millions of children worldwide are affected by dyslexia, a language-based learning disability that can include problems in reading, spelling, writing and pronouncing words. The International Dyslexia Association says there is no consensus on the exact number because not all children are screened, but estimates range from 8% to 15% of students.

Reading an alphabetic language like English requires different skills than reading Chinese, which relies less on sound representation, instead using symbols to represent words. Past studies have suggested that the brain may use different networks of neurons in different languages, but none has suggested a difference in the structural parts of the brain involved, Tan explained.

Tan's research group studied the brains of students raised reading Chinese, using functional magnetic resonance imaging.

They then compared those findings with similar studies of the brains of students raised reading English.

Skin stem cells to treat brain disease

WASHINGTON: Skin cells re-programmed to act like embryonic stem cells eased symptoms of Parkinson's disease in rats, researchers reported on Monday in a first step toward tailored treatments for people that bypass concerns about using human embryos.

The experiments it may be possible to take a small sample of skin and turn it into a transplant perfectly matched to patients with Parkinson's and other diseases, the researchers reported in the Proceedings of the National Academy of Sciences.

It also supports the usefulness of newly created cells that resemble powerful embryonic stem cells. The stem cell experts used so-called induced pluripotent stem cells, which are skin cells reprogrammed to act like embryonic stem cells.

"It's a proof of principle experiment that argues, yes, these cells may have the therapeutic promise that people ascribe to them," said Rudolf Jaenisch, a stem cell expert at the Whitehead Institute and the Massachusetts Institute of Technology.

Researchers have been trying to find ways to harness stem cells, the body's master cells, to treat patients with serious injuries, brain diseases and organ damage caused by conditions such as diabetes.

Stem cells taken from very early embryos appear to be the most malleable and the most powerful. But many people object to their use because the embryo usually must be destroyed to extract them.

Several teams have reported a way to re-program ordinary skin cells to act like embryonic stem cells by adding several genes. Jaenisch's team tested some of these cells in rats and mice. They first got such cells to take up residence in the brains of unborn mice.

Then they damaged the brains of rats to resemble Parkinson's, which is caused by the destruction of certain brain cells that produce a message-carrying chemical called dopamine. Patients lose abilities associated with movement, and progress from a type of shakiness to paralysis and death.

There is no cure. Transplants of cells from fetuses have offered some relief from symptoms in a few people. In the rats, the cell transplants improved symptoms markedly, the researchers said.

"This is the first demonstration that re-programmed cells can integrate into the neural system or positively affect neurodegenerative disease," said MIT's Marius Wernig. One problem with transplanting these powerful but immature cells is that they can differentiate into undesired tissues.

ज्यादा टीवी देखोगे, तो बनोगे खराब

अक्सर बच्चों के एग्जाम के दौरान पैरंट्स टीवी को बंद कर देते हैं और एक स्टडी ने इसे सही भी ठहराया है। स्टडी का कहना है कि जो बच्चे बहुत ज्यादा टीवी देखते हैं, वे पढ़ाई में फिसड्डी रह जाते हैं, खासतौर पर वे बच्चे जिनके बेडरूम में टीवी होता है।

अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ द्वारा की गई स्टडी ने यहां तक कहा है कि ऐसे बच्चे सामाजिक रूप से भी पिछड़ जाते हैं और उनकी सेहत भी औरों की अपेक्षा कमजोर रहती है। दरअसल, जिन बच्चों के बेडरूम में टीवी होता है, वे न तो अपने खाने-पीने का ध्यान ढंग से रखते हैं और न ही पढ़ाई पर ध्यान देते हैं। साथ ही रिसर्च के दौरान यह भी पाया गया ऐसे बच्चे अपने पैरंट्स के साथ भी कम समय बिताते हैं।

रिसर्चरों का कहना है कि 15 से 18 साल की उम्र के करीब 781 किशोरों पर की गई रिसर्च में 62 फीसदी किशोरों के बेडरूम में टीवी नहीं था। रिसर्चरों को इसके नतीजे अपनी उम्मीद के मुताबिक ही मिले। उनका कहना है कि जिन बच्चों के बेडरूम में टीवी था, वे रोजाना औसतन 4 से 5 घंटे टीवी देखते थे। जिन लड़कियों के बेडरूम में टीवी था, वे औरों की अपेक्षा एक्सरसाइज पर कम ध्यान देती थीं। वे कम सब्जियां खाती थीं, जबकि सॉफ्ट ड्रिंक्स ज्यादा लेती थीं। अपने परिवार के साथ बैठकर खाने के मामले में भी वे कम समय देती थीं।


जिन लड़कों के बेडरूम में टीवी होता था, वे क्लास में औरों के मुकाबले पिछड़े पाए गए। खाने के मामले में भी उनका हाल काफी कुछ उन्हीं लड़कियों जैसा था जिनके बेडरूम में टीवी था। ऐसे लड़के अपने परिवार के साथ भी कम समय बिताते थे। प्रमुख रिसर्चर डेहिया बार-एंडरसन ने कहा, रिसर्च के दौरान हमें लगा कि पैरंट्स द्वारा अपने बच्चों को बहुत ज्यादा टीवी देखने पर मना करना असल में सही है। डेहिया बताते हैं कि आमतौर पर पैरंट्स जब घर में नया टीवी लाते हैं, तो पुराने को बच्चों के कमरे में रख देते हैं। ऐसा करना बच्चों के लिए बिल्कुल सही नहीं है।

एंटीबायोटिक तक पचा जाते हैं कुछ बैक्टीरिया

जंगल में शिकारी को तो शिकार बनते अक्सर देखा है लेकिन अब बैक्टीरिया जैसे छोटे जीव भी शिकारी की भूमिका में आ गए हैं। भूल जाइए एंटीबायोटिक दवाओं को क्योंकि वैज्ञानिकों ने अब कुछ सुपर रेसिस्टेंट बैक्टीरिया खोज निकाले हैं। ये ऐसे बैक्टीरिया हैं जिनपर न सिर्फ एंटीबायोटिक बेअसर साबित हो रही हैं बल्कि उल्टे बैक्टीरिया उन्हीं को खाने लगते हैं। हॉवर्ड मेडिकल स्कूल के शोधकर्ताओं ने जॉर्ज एम. चर्च की अगुवाई में ऐसे 400 बैक्टीरिया खोज निकाले हैं। ये दवाओं से ही कार्बन लेकर अपनी जरूरतें पूरी कर लेते हैं।

स्टडी के लिए वैज्ञानिकों ने 11 अलग-अलग जगहों की मिट्टी से बैक्टीरिया के नमूने लिए। इनमें मिनिसोटा के अल्फा- अल्फा और बोस्टन के शहरी इलाकों से लिए गए नमूने भी शामिल थे। शोधकर्ताओं ने इन्हें 18 नेचरल और सिंथेटिक एंटीबायोटिक दिए, इनमें पेनिसिलिन और सिप्रोफ्लॉक्सिन जैसी आम दवाएं भी शामिल थीं। नतीजों में देखा गया कि इन सभी दवाओं में बैक्टीरिया की बराबर बढ़त हुई थी।

शोधकर्ताओं के मुताबिक इन बैक्टीरिया को सुपर रेसिस्टेंट या महा प्रतिरोधक कहा जा सकता है, क्योंकि ये प्रतिरोध की सीमा से 50 गुना ज्यादा ताकतवर एंटीबायोटिक को भी बर्दाश्त कर गए। राहत की बात यही है कि इनमें से कोई भी बैक्टीरिया इंसानों में रोग पैदा करने वाला नहीं है। हालांकि कुछ बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया के नजदीकी रिश्तेदार जरूर थे। इसके अलावा अभी यह भी तसल्ली है कि फिलहाल बीमारियां फैलाने वाले किसी भी बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक को शिकार बनाने की क्षमता नहीं है। वैज्ञानिकों के मुताबिक बैक्टीरिया को हमारे शरीर में ही पनपने के लिए काफी कुछ मिल जाता है।

इसके बावजूद इस स्टडी के नतीजे एक बड़े खतरे की ओर हमें आगाह जरूर करते हैं। एंटीबायोटिक पर पनपने वाले बैक्टीरिया की मौजूदगी बताती है कि नेचरल तौर पर इनमें इतनी प्रतिरोधक क्षमता भी होती है। चूंकि जीन्स के ट्रांसफर से यह खूबी बाकी बैक्टीरिया में आ सकती है इसलिए मुमकिन है कि इंसानों में बीमारी फैलाने वाले बैक्टीरिया मिट्टी में मौजूद अपने भाई बंधुओं से यह ताकत कभी भी पा जाएं।

Wednesday, April 2, 2008

बढ़ेगी तोंद, तो दिमाग होगा खराब

लंदन: कहते हैं न कि ज्यादातर बीमारियों का संबंध पेट से होता है। अब एक स्टडी ने साबित कर दिया है कि अगर पेट निकला हो, तो दिमागी बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है। अभी तक की स्टडीज़ के मुताबिक ज्यादा वजन कई मामलों में खतरे की घंटी साबित होता है, लेकिन ब्रिटेन में की गई इस रिसर्च ने दावा किया है कि बेशक वजन ज्यादा न हो, लेकिन पेट बाहर निकला हुआ है, तो डिमेंशिआ जैसी दिमागी बीमारी आपको अपनी गिरफ्त में ले सकती हैं। रिसर्च का कहना है कि खासतौर पर अधेड़ उम्र के लोगों के लिए यह खतरा तीन गुना बढ़ जाता है। रिसर्च के दौरान 40 से 45 साल के 6500 से ज्यादा लोगों पर स्टडी की गई। इस दौरान बड़ी तोंद वाले लोगों में डिमेंशिआ के लक्षण ज्यादा पाए गए।

शरीर के लिए जरूरी भी है अपेंडिक्स

लंबे वक्त से अपेंडिक्स को शरीर में गैरजरूरी समझा जाता रहा है। डॉक्टर इसका कोई काम नहीं पाते हैं। सर्जन इसे हटाने में भलाई समझते हैं। लोग भी अपेंडिक्स के हटाए जाने पर अच्छा महसूस करते हैं। अब एक स्टडी बताती है कि अपेंडिक्स का संबंध मनुष्य के पाचन तंत्र में बैक्टीरिया की बड़ी मात्रा जमा होने से है। शरीर में जितनी कोशिकाएं होती हैं, उससे ज्यादा बैक्टीरिया होते हैं। ये बैक्टीरिया भोजन पचाने में सहायक होते हैं। रोगों के कारण कभी-कभी बैक्टीरिया का यह समूह मर जाता है या बाहर निकल जाता है। ऐसी अवस्था में अपेंडिक्स का काम पाचन तंत्र को मजबूत करना होता है। यह स्टडी जर्नल ऑफ थियरेटिकल बायॉलजी में प्रकाशित हुई है। इस स्टडी के लेखकों में एक बिल पार्कर कहते हैं कि यह बैक्टीरिया के लिए किलेबंदी का काम करता है। इसकी मौजूदगी की जगह इस बात को साबित करती है। यह बड़ी आंत में उस जगह के ठीक नीचे होता है, जहां से भोजन और कीटाणुओं का एकतरफा बहाव होता है। अपेंडिक्स की आकार जब बढ़ जाए तो समझिए कि बैक्टीरिया की फैक्टरी बन गई, जहां अच्छे कीटाणु पलते हैं। आज भले ही अपेंडिक्स की जरूरत न महसूस होती हो, महामारियों के जमाने में यह काफी उपयोगी हुआ करता था। लेकिन आज भी इसके कारण दर्द हो तो इसे हटवा देना चाहिए, क्योंकि यह जान ले सकता है।

मोटापे से बचना है तो लोगों से कम मिला कर

लोगों से मिलना जुलना बहुत अच्छी बात है। आखिरकार बचपन से सीखते पढ़ते और देखते आए हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। लेकिन कहीं सोशल होने के फेर में ही आपके शरीर पर चर्बी की परतें तो नहीं चढ़ रही हैं। हालिया रिसर्च बताती है कि जो लोग बहुत पार्टी करते हैं या लोगों से मिलते-जुलने और ग्रुप में वक्त बिताने में यकीन करते हैं वो चुपचाप अपने में सिमटे रहने वाले लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा मोटे होते हैं या इसकी आशंका कहीं ज्यादा होती है। जापान में आउटिंग और मोटापे के संबंध को जांचने के लिए एक स्टडी की गई। इसके लिए नॉर्थ ईस्ट जापान के 40 से 64 की उम्र के बीच के लगभग 30 हजार लोगों से सवाल जवाब किया गया। इसकी रिपोर्ट साइकोमैटिक नाम के जर्नल में प्रकाशित की गई है। मोटापा जानने के लिए प्रचलित बॉडी मास इन्डेक्स (बीएमआई) के पैमाने पर इन लोगों का स्वास्थ्य मापा गया था। रिपोर्ट के मुताबिक तफरी के लिए बाहर जाने वाले लोगों में बीएमआई 25 तक होने की बहुत ज्यादा आशंका रहती है। इन लोगों को मोटापा बढ़ाने वाले बाकी फैक्टर जैसे स्मोकिंग वगैरह से दूर रखा गया और इसके बाद फैट ग्रोथ रेट देखी गई। जो लोग काम के अलावा ज्यादातर वक्त घर के बाहर बिताते हैं और लोगों से घुलने मिलने में यकीन रखते हैं उनमें अंतर्मुखी स्वभाव के लोगों के मुकाबले मोटापे की आशंका 1.73 गुना ज्यादा होती है जबकि महिलाओं में ये अनुपात थोड़ा सा कम 1.53 है। इस रिपोर्ट में चिंता करने की आदत के शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव को भी जांचा गया। इसके मुताबिक जो लोग ज्यादा सोचते हैं और सोच-सोचकर परेशान रहते हैं उनका वजन औसत से भी कम रहता है। आंकड़े बताते हैं कि ज्यादा बेचैन रहने वाले लोग बीएमआई पर 18.5 के नीचे ही ठहरते हैं। यानी बेफिक्र रहने वालों की तुलना में उनका वजन सामान्य से कम रह जाने की आशंका दोगुनी होती है।

सिगरेट से ज्यादा घातक है आपका सेलफोन

लंदन: क्या आप यह जानते हैं कि मोबाइल पर बतियाने का आपका शौक स्मोकिंग से ज्यादा खतरनाक है? जी हां, भारतीय मूल के एक रिसर्चर ने कुछ ऐसा ही दावा किया है। ब्रिटेन में रिसर्चर डॉ. विनी खुराना ने अपनी रिसर्च के हवाले से बताया है कि मोबाइल फोन से निकलने वाला रेडिएशन स्मोकिंग से ज्यादा खतरा पैदा करता है। खुराना ने कहा, बेशक मोबाइल फोन इमरजेंसी के मौके पर हमारी जान बचाता है, लेकिन यह भी सच है कि इससे कुछ खास तरह के ब्रेन ट्यूमर और मोबाइल फोन में कुछ समानताएं देखी गई हैं। खुराना की रिसर्च रिपोर्ट 'द इंडिपेंडेंट' अखबार में छपी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक स्मोकिंग से हर साल दुनिया भर में करीब 50 लाख लोग मारे जाते हैं। हालांकि, खुराना का कहना है कि मोबाइल से निकलने वाले रेडिएशन से इससे कहीं ज्यादा मौत हो सकती हैं। खुराना ने 100 से ज्यादा रिसर्च के आधार पर यह नतीजा निकाला है। खुराना ने बताया, फिलहाल हमें इस खतरे का अहसास नहीं हो पा रहा है, लेकिन अगले 10 सालों में हमें यह साफ-साफ देखने को मिलेगा। एक प्रमुख कैंसर एक्सपर्ट ने बताया कि लोगों को मोबाइल का इस्तेमाल जरूरी होने पर ही करना चाहिए। सरकार और मोबाइल फोन उद्योग को रेडिएशन के मामले में तुरंत कदम उठाने चाहिए। अगर इस मामले में जल्द ही कुछ नहीं किया, तो अगले दशक तक बहुत भयानक नतीजे देखने को मिल सकते हैं। हालांकि, दूसरी ओर मोबइल ऑपरेटर्स असोसिएशन ने खुराना की रिसर्च रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया है।

Monday, March 24, 2008

बिल्ली पालने से कम होगा हार्ट अटैक

आप मानें या ना मानें, लेकिन यह एक विचित्र सत्य है। लंदन में शोधकर्ताओं ने एक अजीबोगरीब रहस्य से परदा उठाया है कि अगर आप बिल्ली पालते हैं, तो हार्ट अटैक से मौत की संभावना 3 गुना कम हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक टीम ने इस बात का पता लगाया है कि बिल्ली को पालने से हार्ट अटैक की संभावना 3 गुना कम हो जाती है। इसकी वजह यह है कि बिल्ली पालने से तनाव और चिंता से निजात पाने में काफी हद तक मदद मिलती है। इसके अलावा ब्लड प्रेशर नियंत्रण रखने में भी मदद मिलती है जिसके फलस्वरूप कार्डियोवैस्कुलर समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है। मिनेसोटा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अदनान कुरैशी ने 'दि टेलीग्राफ' के हवाले से कहा कि बिल्ली पालने वाले कुछ लोगों पर अध्ययन करने के बाद यह बात सामने उभर कर आई कि ऐसे लोग तनाव और चिंता से मुक्ति पाते हैं जिसके परिणामस्वरूप हार्ट डिजीज का रिस्क काफी हद तक कम हो जाता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि बिल्ली पालने से रक्त में तनाव से जुड़े हार्मोन का स्तर कम हो जाता है। शोधकर्ताओं की टीम ने 30 से 75 वर्ष तक की आयु के 4,435 लोगों पर अध्ययन किया। इनमें से लगभग आधे लोगों ने बिल्ली पाल रखी थी। शोधकर्ताओं ने अध्ययन में हार्ट अटैक समेत सभी कारणों से होने वाली मौतों पर गौर किया। इसके बाद वे ही इस निष्कर्ष पर पहुंचे। प्रोफेसर कुरैशी ने बताया कि एक दशक के अंतराल में बिल्ली न पालने वालों की तुलना में बिल्ली पालने वाले हार्ट अटैक से बहुत कम मरते हैं। उन्होंने आगे बताया कि यह बात आश्चर्यजनक भले ही लगती हो, लेकिन सत्य यह है कि इसके प्रभाव से हार्ट अटैक की संभावना 30 फीसदी कम हो जाती है। कुरैशी ने बताया कि शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में हार्ट डिजीज के कुछ कारणों मसलन कोलेस्ट्रेल लेवल, धूम्रपान और डायबीटीज पर भी गौर किया। उन्होंने आगे बताया कि जब हम इस बाबत शोध कर रहे थे तो निश्चित रूप से हम इसके प्रभाव की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन बिल्ली पालने का असर इतना प्रभावी होगा, यह हमने सोचा भी नहीं था।

विटामिन-बी लें और बनें हेल्दी बच्चे के बाप

पिता बनने की ख्वाहिश रखने वाले लोगों के लिए एक अच्छी सलाह है। उन्हें विटामिन-बी से भरपूर खुराक लेनी चाहिए। एक नई स्टडी में कहा गया है कि जो पुरुष अपने खाने में विटामिन-बी से प्रचुर आहार लेते हैं, उनके बच्चों के कहीं ज्यादा स्वस्थ होने की संभावना होती है। अंतरराष्ट्रीय रिसर्चरों की एक टीम ने पता लगाया है कि पुरुषों द्वारा हरी सब्जियों, फलों और दालों जैसे फॉलिक एसिड से भरपूर खाद्य पदार्थों के सेवन से उनके द्वारा असामान्य स्पर्म (वीर्य) पैदा होने और इसके नतीजतन उनके बच्चों में जिनेटिक असामान्यता पैदा होने की आशंका कम हो जाती है। इस स्टडी के लीड रिसर्चर यूनिवसर्विटी ऑफ कैलिफॉर्निया के प्रोफेसर ब्रेंडा स्केनाजी के मुताबिक, स्वस्थ बच्चा पैदा करने के लिए मां के अच्छा आहार लेने की जरूरत से तो लोग अच्छी तरह परिचित हैं। अब स्टडी से पता चलता है कि होने वाले बच्चे के पिता द्वारा अच्छा आहार लेना भी महत्वपूर्ण हो सकता है। उन्होंने कहा कि पहले की स्टडीज में हमने यह दिखाया है कि पिता द्वारा लिया जाने वाला आहार स्पर्म की क्वॉलिटी को सुधारकर कामयाब गर्भधारण में योगदान कर सकता है। रिसर्च टीम ने इन नतीजों तक पहुंचने के लिए स्मोकिंग न करने वाले 89 स्वस्थ मर्दों के वीर्य के सैंपल का अध्ययन किया। इन मर्दों से उनके द्वारा अपने भोजन में लिए जाने वाले जिंक, विटामिन-सी, विटामिन-ई, फॉलिक एसिड जैसे पोषक तत्वों के बारे में पूछताछ की गई। स्टडी से पता चला कि जिन मर्दों ने सबसे ज्यादा फॉलिक एसिड (हर रोज 722 से 1150 माइक्रोग्राम) का सेवन किया, उनके क्रोमोसोमों की तादाद में परिवर्तन का स्तर उन लोगों की तुलना में 20 से 30 फीसदी कम था जिन्होंने कम मात्रा में इसका सेवन किया। गौरतलब है कि क्रोमोसोमों की तादाद में परिवर्तन से गर्भधारण में नाकामी, गर्भपात या फिर अस्वस्थ शिशु के जन्म जैसी समस्याएं हो सकती हैं।